शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

अन्नदाता को मारती नेतागीरी


कुछ लोगों को इस से आपत्ति हो सकती है, किन्तु सच्चाई को स्वीकार करना भी राजनीति का हिस्सा होना चाहिए। एक ओर प्रदेश की डॉ. रमन की सरकार जहां सूखाग्रस्त क्षेत्रों, ओलावृष्टि से प्रभावित क्षेत्रों के किसानों को झुनझुना पकड़ा कर अपने जिम्मेदारी और सरकारी दायित्व से बचने के फिराक में है, तो वहीँ दूसरी ओर मजबूत विपक्ष का दावा करने वाली कांग्रेस केवल धरने और प्रदर्शन कर किसानों को राहत देने के अपने विपक्षी दायित्व को निभा रही है। चुनाव के दौरान इलेक्शन कमीशन को दिये इन विधायकों की जानकारी के अनुसार लगभग लगभग हर विधायक अपने आप को किसान बताता है, किन्तु सच्चाई तो यह है की किसानों के दर्द को समझने और महसूस करने वाला दिल किसी के पास है ही नहीं। साहेब सच्चाई तो यह है की राजनीति में आने से पहले अधिकतर विधायक किसान हुआ करता था, किन्तु राजनीति के रोग ने बिना खेती किसानी किये, खेतों से फसल लेने की झूठी लत लगा दी है। नोट के इस बाजार में हम इतने आगे निकल चुके हैं कि आपसी मुद्दे, समाज की समस्याएं सामाजिक न रहकर आपसी हो गई है, राजनीतिक उठा पटक में हम यह भुल चुके हैं, फसल खेतों पर ही लहलहाते हैं और खेतों से आने के बाद ही हमारी भूख को मिटाने का कार्य करती है, जो लोग राजनीतिक उठापटक, दलीय राजनीति में लीन होकर जमीनी मुद्दों से भटक रहे हैं, उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि खाने को अन्न इसी धरती पर उगेंगे, अभी मंगल पर फसल उत्पादन करने की तकनीक नहीं बनी है, अभी उसमें थोड़ा समय है, तब तक कम से कम नोट की गर्मी से थोड़ी राहत मिले तो जमीन से जुड़ कर जमीन के मुद्दों के लिये लड़ाई लड़ीये साहब, आज इसकी आवश्यकता है। 
            राजनीति में आने के बाद विधायक बनते ही इन नेताओं खाने के खर्चे से लेकर घूमने के खर्चे तक, बीबी की बिमारी से लेकर फोन के बिल तक, हवाई की सवारी से लेकर लखटकिया के डीजल तक सब जनता के पैसे से इन्हें फ्री में मिलता है। कभी बाज़ार में जाकर कुछ खरीदने की जरुरत ही नहीं पड़ती, चापलूस कार्यकर्ता अपना काम कराने, गाहे-बगाहे कुछ न कुछ पंहुचा दिया करते हैं। ऐसे में इन्हें न तो चावल का भाव मालूम रहता है ना तो बिमारी का खर्चा, बच्चे की पढाई और ना ही कपड़े की खरीददारी का भाव मालूम होता है।ऐसे में इन नेताओं को यह लगता है की सूखे से बर्बाद और ओलवृष्टि से प्रभावित खेतों के पुरे बर्बाद फसल के बदले मात्र 2 से 5 हजार की संवेदना और सहायता से क्या क्या होता होगा, कभी इन नेताओं को कृषकों के घरों में रुक कर उनकी जिंदगी जीने की कोशिश करनी चाहिए।
          देश से अंग्रेज चले गये, लेकिन अंग्रेजी कानून और उनकी नीति आज भी देश के सत्ताधीश ठीक उसी तरीके से ढो रहे हैं, जैसे विरासत में मिली रूढ़ि परम्पराओं को हमारा समाज ढो रहा, चाहे वह सही हो या गलत, हमें वही करना है, जो हमारे पूर्वजों ने किया। समाज के पास तो यह लाचारी है की वे अपने पूर्वजों के नियमों की अवहेलना नहीं कर सकते। किन्तु देश को गुलाम बनाने वाले लोगों की परम्पराओं को उनकी नीतियों को, उनके कानूनों को लगातार चलाते रहना कहाँ का न्याय है और यह कैसी व्यवस्था है। 
             देश के कानूनों में बदलाव होना चाहिए, सरकार को यह नीति निर्धारित करनी चाहिए की पिछले सीजन में जब की मौसम सही था और सारे साधन ठीक थे, तो प्रभावित किसानों ने कितनी फसल का उत्पादन किया, कितना मंडी तक पहुंचा, कितना उन्होंने अपने लिए रखा। कम से कम उक्त फसल उत्पादन का 70 से 80 प्रतिशत के बराबर फसल का दाम मुआवजे के रूप में मिलना चाहिए। जिससे उसका घर भी चल सके और सारे कार्य ठीक ढंग से हो सके। अन्यथा ऐसी दया अन्नदाता पर दिखाने की आवश्यकता नहीं, जिससे ना तो वह मर सके और न ही मोटा सके। इस तरह की रणनीति देश को ऐसे रास्ते पर ले जायेगी, जहां से अन्न का उत्पादन इस कदर प्रभावित हो जायेगा, की लोग अन्न के लिये तरसेंगे। 
           धीरे धीरे वैसे भी हम उस रास्ते पर निकल पड़े हैं, जहां हमारी युवा पीढ़ी कृषि को घाटे का कार्य मानती है, ऐसे में कृषि से जुड़ना वर्तमान पीढ़ी के लिये अंतिम कार्य रह गया है, जब कहीं कोई जुगाड़ नहीं तब कृषि को अपनाना शुरू करते हैं।अब सवाल यह है की किसानों के मुद्दे को संजीदगी के साथ उठाने का कार्य कौन करेगा, क्या सत्तासीन दल इस मुद्दे पर कुछ सकारात्मक कदम उठा कर किसानों को राहत देना चाहेगी, या फिर एक मजबूत विपक्ष किसानों के साथ संजीदगी और किसानों को सही मुआवजा दिलाने पहल करेगी।
           माननीय देश के तारणहार कृपया थोड़ी सी आपसी उठा-पटक को किनारे कर देश के लिये सोचिये, यू तो आप सब ने मिलकर देश के नदी, नालों, बांध, पहाड़ हर चीज का सौदा कर ही दिया है, किन्तु जो बचा है और उस खेत से जो लोग जुड़े हैं, उनके लिए गंभीरता से सोचिये। कही ऐसा न हो की आपके कर्मों को देश का वर्तमान और भविष्य माफ़ ही ना करें। जब खाना सबको है तो उत्पादन ना सही, किंतु इससे जो जुड़े हैं, उनकी समस्याओं के प्रति गंभीरता से विचार कर, उसका उचित निदान तो करें।

                                    जहां रिश्वत, प्रलोभन और नोट के बाजार में,
                                   पैदा होता देश का तारणहार है,
                                   कुर्सीयों की दौड़ में वोट का करता जो नोट से व्यापार है,
                                   क्या वो देश को चला पायेगा ?
                                   या हमारा अन्नदाता यूं ही मर जायेगा।
- अंचल ओझा